आसमान नीला इसलिए दिखता है क्योंकि सूर्य की रोशनी जब वायुमंडल से गुज़रती है, तो हवा के अणु (मुख्य रूप से नाइट्रोजन और ऑक्सीजन) नीली और बैंगनी जैसी छोटी तरंगदैर्घ्य वाली रोशनी को लाल जैसी लंबी तरंगदैर्घ्य वाली रोशनी से कहीं ज़्यादा बिखेर देते हैं। इस प्रक्रिया को रैले प्रकीर्णन (Rayleigh scattering) कहते हैं। बिखरी हुई यह नीली रोशनी आसमान में हर दिशा से हमारी आँखों तक पहुँचती है।

सूरज की रोशनी सफ़ेद दिखती है, पर होती है कई रंगों की

सूर्य की रोशनी हमें सफ़ेद-पीली लगती है, लेकिन उसमें इंद्रधनुष के सभी रंग मिले होते हैं। हर रंग की तरंगदैर्घ्य अलग होती है। बैंगनी की सबसे छोटी और लाल की सबसे लंबी।

जब यह रोशनी वायुमंडल में आती है, तो हवा के अणुओं से टकराकर अपनी दिशा बदलती है। इसी को प्रकीर्णन कहा जाता है। अगर सूर्य को सीधे देखें तो वह सफ़ेद-पीला दिखता है, लेकिन सूर्य से दूर किसी भी दिशा में देखें तो आपको अणुओं द्वारा बिखेरी गई रोशनी दिखती है।

रैले प्रकीर्णन क्या है?

इसका नाम 19वीं सदी के ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी लॉर्ड रैले के नाम पर है। हवा के अणु दृश्य प्रकाश की तरंगदैर्घ्य से बहुत छोटे होते हैं, और ऐसे कण छोटी तरंगदैर्घ्य को ज़्यादा प्रभावी ढंग से बिखेरते हैं। वैज्ञानिक भाषा में कहें तो प्रकीर्णन तरंगदैर्घ्य की चौथी घात के व्युत्क्रमानुपाती होता है। यानी तरंगदैर्घ्य थोड़ी घटे तो बिखराव काफ़ी बढ़ जाता है। आइंस्टाइन ने 1911 में अणुओं से प्रकाश के बिखराव का विस्तृत सूत्र निकाला, जो प्रयोगों से मेल खाया।

वायुमंडल न हो तो यह प्रक्रिया भी नहीं होगी। इसीलिए चंद्रमा से लिए गए चित्रों में दिन में भी आसमान काला दिखता है।

तो आसमान बैंगनी क्यों नहीं दिखता?

सबसे ज़्यादा बिखराव बैंगनी रंग का होता है, फिर भी आसमान नीला दिखता है। इसके दो कारण बताए जाते हैं:

  • सूर्य से बैंगनी रोशनी कम आती है। सूर्य नीली रोशनी की तुलना में बैंगनी कम छोड़ता है।
  • हमारी आँखें बैंगनी के प्रति कम संवेदनशील हैं। आँख के तीन तरह के कोन (रंग पहचानने वाली कोशिकाएँ) अलग-अलग अनुपात में उत्तेजित होते हैं, और दिमाग इसी मिश्रण से रंग बनाता है।
    इस मिश्रण का नतीजा हमें नीले जैसा दिखता है।

इसीलिए कहा जाता है कि हमारा आसमान असल में “नीला” होने के साथ-साथ हमारी आँखों की बनावट का नतीजा भी है।

सूर्यास्त के समय आसमान लाल क्यों हो जाता है?

वजह वही है, बस रास्ता बदल जाता है। दोपहर में सूर्य की रोशनी वायुमंडल की अपेक्षाकृत पतली परत से होकर आती है। सूर्योदय और सूर्यास्त पर सूर्य क्षितिज के पास होता है, इसलिए किरणों को वायुमंडल में बहुत लंबा रास्ता तय करना पड़ता है।

इस लंबे सफ़र में नीली और बैंगनी रोशनी रास्ते में ही बिखरकर हमारी सीधी दृष्टि-रेखा से बाहर निकल जाती है।

बचती है पीली, नारंगी और लाल रोशनी, जो सीधी हम तक पहुँचती है। अमेरिकी मौसम-विज्ञानी इसे यूँ भी समझाते हैं कि सूर्यास्त इसलिए लाल होता है क्योंकि दिन का आसमान नीला है। जो किरण एक जगह लाल सूर्यास्त बना रही होती है, वही दूसरी जगह नीले आसमान में योगदान दे रही होती है।

क्षितिज पर आसमान हल्का और ऊँचाई पर गहरा क्यों?

क्षितिज की ओर देखने पर रोशनी को ज़्यादा हवा से गुज़रना पड़ता है, इसलिए वहाँ का आसमान हल्के रंग का दिखता है। बहुत ऊँचाई पर हवा पतली होती है, कम अणु होते हैं, इसलिए सिर के ऊपर आसमान गहरा नीला या नीला-बैंगनी हो सकता है।

मंगल पर आसमान किस रंग का होता है?

रिपोर्टों के अनुसार NASA के रोवर और लैंडर की तस्वीरों में मंगल का दिन का आसमान नारंगी या गुलाबी-भूरा दिखता है, जबकि सूर्य के आसपास का हिस्सा नीला-धूसर दिखाई देता है। इसकी वजह वहाँ के वायुमंडल में तैरते बारीक धूल कण बताए जाते हैं। (इस हिस्से के लिए हमने सीधे NASA का पेज नहीं जाँचा; पुष्टि के लिए NASA की साइट देखें।)

आम गलतफ़हमियाँ

  • “आसमान समुद्र का प्रतिबिंब है”: नहीं। आसमान का रंग वायुमंडल में रोशनी के बिखराव से बनता है।
  • “आसमान का अपना कोई रंग होता है”: नहीं। यह रंग तभी दिखता है जब सूर्य की रोशनी वायुमंडल से टकराती है।
  • “बादल भी नीले क्यों नहीं?”: बादलों की बूँदें हवा के अणुओं से कहीं बड़ी होती हैं और सभी रंगों को लगभग बराबर बिखेरती हैं। मिले-जुले रंग मिलकर सफ़ेद दिखते हैं।

परीक्षा के लिए याद रखें

यह सवाल स्कूल और प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर आता है। इसका सार तीन बातों में है: आसमान का नीला रंग रैले प्रकीर्णन से बनता है, बैंगनी रंग ज़्यादा बिखरता है पर आँख उसके प्रति कम संवेदनशील है, और सूर्यास्त का लाल रंग लंबे मार्ग में नीले-बैंगनी के बिखर जाने से बनता है।

निष्कर्ष

नीला आसमान और लाल सूर्यास्त दो अलग घटनाएँ नहीं हैं। दोनों एक ही नियम का नतीजा हैं, बस रोशनी का रास्ता अलग है। अगली बार शाम को आसमान देखें तो याद रखिए कि आप असल में सूर्य की रोशनी के बिखरे हुए रंगों को देख रहे हैं।

स्रोत: University of Wisconsin–Madison, NOAA/NWS, UC Riverside Physics FAQ, University of Cambridge (Murray Edwards College), Durham University। लिंक Section 6 में हैं।

SECTION 8: FAQ

1. आसमान नीला क्यों दिखाई देता है?

हवा के अणु सूर्य की नीली और बैंगनी रोशनी को ज़्यादा बिखेरते हैं। यह बिखरी रोशनी हर दिशा से हम तक आती है, और हमें आसमान नीला दिखता है।

2. आसमान बैंगनी क्यों नहीं दिखता?

सूर्य से बैंगनी रोशनी कम आती है और हमारी आँखें उसके प्रति कम संवेदनशील हैं।

3. सूर्यास्त लाल क्यों होता है?

क्षितिज पर किरणों को वायुमंडल में लंबा रास्ता तय करना पड़ता है, जिसमें नीला-बैंगनी हिस्सा बिखर जाता है और लाल-नारंगी बचा रहता है।

4. क्या आसमान समुद्र की वजह से नीला है?

नहीं। रंग वायुमंडल में प्रकाश के बिखराव से बनता है, समुद्र के प्रतिबिंब से नहीं।

5. अंतरिक्ष में आसमान काला क्यों दिखता है?

वहाँ बिखेरने वाला वायुमंडल नहीं होता, इसलिए हमारी आँखों तक बिखरी रोशनी नहीं पहुँचती।