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Applied Energy जर्नल में 2024 में पब्लिश हुई एक रिसर्च के मुताबिक, खास तरह से डिज़ाइन की गई एक रूफ ने टेस्ट रूम को, आम कंक्रीट रूफ वाले उसी जैसे कमरे के मुक़ाबले, काफ़ी ठंडा रखा। गर्मियों में कमरे की हवा के तापमान में ज़्यादा से ज़्यादा 5.5°C का फ़र्क़ रिकॉर्ड किया गया।
भारत के लिए यह रिज़ल्ट इसलिए मायने रखता है कि यहाँ छतें तेज़ धूप सोख लेती हैं और घर अंदर से तपने लगते हैं। लेकिन इस एक्सपेरिमेंट में एक स्पेशलाइज़्ड पैसिव रेडिएटिव-कूलिंग मटेरियल इस्तेमाल हुआ था, सफ़ेद पेंट की आम परत नहीं, और यह टेस्ट चीन में हुआ था। इसलिए इस नतीजे को हर भारतीय घर का नतीजा नहीं मानना चाहिए।
एक्सपेरिमेंट में क्या सामने आया?
रिसर्चर वेनशुओ झांग, डोंगशेंग जियाओ, बिन झाओ और गैंग पेई ने चीन के हेफ़ेई शहर में कंक्रीट के दो टेस्ट रूम बनाए। एक कमरे की छत पर पैसिव रेडिएटिव-कूलिंग मेटामटेरियल की कोटिंग थी। दूसरे की छत आम कंक्रीट की थी और उसे रेफ़रेंस रूम की तरह रखा गया।
जब कमरे का टेम्परेचर-कंट्रोल सिस्टम बंद था, तब गर्मियों की टेस्टिंग में खास रूफ वाला कमरा ज़्यादा से ज़्यादा 5.5°C और औसतन 1.8°C ठंडा रहा।
जब टेम्परेचर-कंट्रोल सिस्टम ऑन था, तब उसी कमरे में गर्मियों में रोज़ाना कूलिंग लोड 29.1% कम रहा। लेकिन सर्दियों में हीटिंग लोड 4.1% बढ़ गया, क्योंकि जब कमरे को गर्म रखना था, तब भी रूफ गर्मी बाहर निकालती रही।
यह दो टेस्ट रूम की कंट्रोल्ड तुलना थी। अलग-अलग घरों, अलग रूफ डिज़ाइन या भारतीय मौसम में किया गया ट्रायल नहीं।
पैसिव रेडिएटिव कूलिंग कैसे काम करती है?
पैसिव रेडिएटिव-कूलिंग मटेरियल सूरज की रोशनी को रिफ़्लेक्ट करता है और साथ ही गर्मी को ऐसी वेवलेंथ में बाहर छोड़ता है जो वायुमंडल से निकल जाती हैं। सही हालात में इससे सतह बिना किसी बिजली वाले सिस्टम के ठंडी होती है।
यह छत पर सफ़ेद पेंट करने जैसा नहीं है। सोलर-रिफ़्लेक्टिव कोटिंग छत को कम धूप सोखने देती है, जबकि चीन की स्टडी वाला मटेरियल ज़्यादा स्पेशलाइज़्ड डिज़ाइन पर बना है। दोनों का मक़सद इमारत में गर्मी का आना कम करना है, पर दोनों एक-दूसरे की जगह नहीं ले सकते। परफ़ॉर्मेंस मटेरियल, इंस्टॉलेशन, मौसम, रूफ की बनावट और लोकल क्लाइमेट पर निर्भर करती है।
क्या भारत में भी इसकी टेस्टिंग हो रही है?
हाँ, लेकिन अलग टेक्नोलॉजी के साथ। ग्लोबल ग्रीन ग्रोथ इंस्टिट्यूट (GGGI) जनवरी 2025 से दिसंबर 2026 तक एक प्रोजेक्ट चला रहा है, जिसमें केरल और आंध्र प्रदेश की 20 रिहायशी इमारतों में सोलर-रिफ़्लेक्टिव कूल-रूफ कोटिंग का डेमो किया जा रहा है।
प्रोजेक्ट को उम्मीद है कि हर बिल्डिंग में सालाना 150-250 kWh एनर्जी की बचत होगी और इनडोर तापमान 4-6°C कम होगा। ये अभी उम्मीदें हैं, कन्फ़र्म्ड रिज़ल्ट नहीं। प्रोजेक्ट का मक़सद टेक्निकल गाइडलाइन तैयार करना भी है, इसलिए इसके नतीजे भारतीय होमओनर्स और पॉलिसी बनाने वालों के काम आ सकते हैं।
क्या कूल रूफ से बिजली का बिल कम होगा?
कूलिंग की डिमांड घट सकती है, लेकिन कितनी बचत होगी यह आपके घर और रूफ ट्रीटमेंट पर निर्भर करता है। 29.1% का आँकड़ा टेस्ट रूम के कूलिंग लोड में कमी का है, किसी घर के पूरे बिजली बिल में कमी का नहीं। बिल में पंखे, अप्लायंसेज़ और लाइटिंग का खर्च भी शामिल होता है।
रिसर्चर्स ने दूसरे क्लाइमेट ज़ोन के लिए मॉडलिंग भी की। उनके नतीजों के मुताबिक, जिन इलाकों में कूलिंग की डिमांड ज़्यादा रहती है, जैसे ट्रॉपिकल और सबट्रॉपिकल ज़ोन, वहाँ पैसिव रेडिएटिव कूलिंग से इमारत का कुल एनर्जी लोड घटता है, जबकि जहाँ हीटिंग की डिमांड ज़्यादा है वहाँ यह बढ़ जाता है। भारत के ज़्यादातर हिस्सों में कूलिंग बड़ी ज़रूरत है, पर सर्दियों का यह नुक़सान याद दिलाता है कि सही मटेरियल क्लाइमेट पर निर्भर करता है।
रूफ ट्रीटमेंट चुनने से पहले क्या पूछें?
- प्रोडक्ट असल में क्या करता है? पता करें कि यह रिफ़्लेक्टिव कोटिंग है, इंसुलेशन सिस्टम है या स्पेशलाइज़्ड रेडिएटिव-कूलिंग मटेरियल।
- दावे का सबूत क्या है? ऐसी बिल्डिंग्स के टेस्ट रिज़ल्ट माँगें जिनकी रूफ और क्लाइमेट आपके जैसे हों।
- रूफ की तैयारी कैसे होगी? मौजूदा सतह, मरम्मत और अप्लिकेशन का तरीक़ा परफ़ॉर्मेंस पर असर डाल सकता है।
- कितने समय तक चलेगा? मेंटेनेंस, दोबारा कोटिंग और वारंटी की शर्तें पूछें।
- कुल खर्च कितना आएगा? इंस्टॉलेशन और मेंटेनेंस का खर्च, संभावित बिजली बचत के realistic अनुमान से मिलाकर देखें।
तापमान घटने के किसी एक आँकड़े पर तब तक भरोसा न करें, जब तक यह न पता हो कि उसे नापा कैसे गया। टेस्ट रूम का रिज़ल्ट अपने आप यह नहीं बता देता कि रहने वाले घर में क्या होगा।
निष्कर्ष
रूफ का डिज़ाइन और मटेरियल घर की गर्मी बदल सकते हैं, और ज़्यादा आरामदायक और एनर्जी-एफ़िशिएंट बिल्डिंग्स की बड़ी रणनीति के हिस्से के तौर पर पैसिव कूलिंग पर ध्यान देना बनता है। 5.5°C का आँकड़ा एक ख़ास एक्सपेरिमेंट और एक स्पेशलाइज़्ड मटेरियल का है। भारत के लोकल सबूत GGGI प्रोजेक्ट से 2026 के अंत तक मिलने की उम्मीद है। तब तक होमओनर्स को लोकली रिलेवेंट परफ़ॉर्मेंस डेटा देखना चाहिए, यह समझना चाहिए कि कौन-सी टेक्नोलॉजी ऑफ़र हो रही है, और खर्च व संभावित फ़ायदे की तुलना करके ही फ़ैसला लेना चाहिए।
सोर्स: Zhang, Jiao, Zhao & Pei, “Experimental and numerical investigation of the effects of passive radiative cooling-based cool roof on building energy consumption”, Applied Energy, Vol. 376 (2024) · Global Green Growth Institute (GGGI), “Advancing Thermal Comfort and Energy Savings through Cool Roofs in Indian Residential Buildings”